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अन्तराभिवाची वाद से सम्बन्धित प्रावधान निहित है :
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Aसी.पी.सी. के आदेश 34 में
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Bसी.पी.सी. के धारा 88 में
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Cसी.पी.सी. के आदेश 35 में
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D(b) एवं (c) दोनों
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यह कि अन्तराभिवाची वाद एक वाद है :
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Aऐसे व्यक्ति द्वारा संस्थित वाद जो वाद की विषय-वस्तु में स्वयं कोई हित न रखता हो
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Bदो अधिवक्ताओं के मध्य
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Cसंघ सरकार के अधिवक्ता एवं राज्य सरकार के अधिवक्ता के मध्य
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Dऐसे व्यक्ति द्वारा संस्थित वाद जो विषय-वस्तु में स्वयं हित रखता हो
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अन्तराभिवचनीय वाद दाखिल नहीं किया जा सकता है
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Aउस संपत्ति को अपने पास रखने से स्वयं को मुक्त करने के लिए जो संपत्ति उसके पास है
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Bजहाँ ऐसा वाद लंबित है जिसमें सभी पक्षों के अधिकारों का उचित विनिश्चय किया जाना हो
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Cकिसी संपत्ति और उसकी माँग करने वाले व्यक्तियों के बीच संबंध तय करने के लिए
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Dऐसी संपत्ति के लिए जो दो व्यक्तियों से संबंधित हो परन्तु उस समय वह तीसरे व्यक्ति के पास हो
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A' आभूषणो का एक बाक्स अपने अभिकर्ता के रूप में 'B' के पास निक्षिप्त करता है| 'C' का यह अभिकथन है कि आभूषण 'A' ने उससे सदोष अभिप्राप्त किए थे और वह उन्हें 'B' से लेने के लिए दावा करता है| यहाँ 'B'
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AC' के विरुद्ध अन्तराभिवाची वाद दायर कर सकता है
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BA' के विरुद्ध अन्तराभिवाची वाद दायर कर सकता है
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CA' तथा 'C' दोनों के विरुद्ध अन्तराभिवाची वाद दायर कर सकता है
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DA' तथा 'C' दोनों के विरुद्ध अन्तराभिवाची वाद दायर नहीं कर सकता है
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निम्न धाराओं में से कौन सिविल प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 1999 के द्वारा नई जोड़ी गई है?
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Aधारा 89
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Bधारा 87
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Cधारा 88
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Dधारा 90
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